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Farewell Shayri in Hindi | Farewell Shayri for Teachers in Hindi | Teachers Day Shayri in Hindi

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आज भी नम हो जाती यह आँखे
जब बात विद्यालय की आती है
आज भी जब निराश होती हु
तो आपकी कही हुयी हर बात बात याद आती है
क्योंकि
विद्याधन से अमूल्य कुछ भी नही
और गुरु जैसा इस दुनिया मे और कोई नही।
जिनके चरणों की धूल से यह जिंदगी जन्नत बनती है
जिनके प्यार और अपनेपन से जिंदगी की मंज़िल मिलती है
जिनकी खुशी अपने बच्चो के उपलब्धि से होती से
ऐसे माँ, बाप और गुरु के होने से ही जिंदगी की सफ़लता हासिल होती है।
गुरु के चरणों मे सत सत नमन है
भावना से हमारा उनको अभिनन्दन है
दुनिया के प्रकाशपुंज का करते हम गुणगान है
सारी दुनिया की और से उनको वंदन बारंबार है।
हम एक बेहतर इंसान तो बन गए है
पढ़ लिख कर विद्धवान तो बन गए है
अगर गिरते है तो संभलना सिख गए है
किस रास्ते पे चलना है वो भी समझ गए है
कहा इन्वेस्ट करना है और किस चीज़ से दूर रहना है यह भी सिख गए है
सही और गलत के बीच का फर्क करना सीख गए है।
पर इन सबका credit किसको जाता है
वही जो डेबिट कार्ड बनकर घूमता है
और हमारी सफलता में मंद मंद मुस्कुराता है
वह गुरु ही है
जो हमे एक बेहतर इंसान बनाता है।
क्या तारीफ़ करू में sir आपकी, अल्फ़ाज़ भी कम पड़ जायेंगे
आपकी उपलब्धि को बताने लगी तो सुबह से शाम हो जायेंगी
बस इतना ही कहना चाहुगी-
न हर समुन्द्र में मोती सदा खिलते है
न हर मंज़र में दीप सदा जलते है
पर जिनके खिलने से समस्त उपवन खिल उठे
ऐसे पुष्प उपवन में सदियों बाद ही खिलते है |
हमसे हमारा परिचय करवाता है
सही और गलत के बीच का फर्क हमे बताता है
उंगली पकड़कर एक कक्षा से दूसरी कक्षा का सफ़र करवाता है
रास्ते मे आयी हर कठिनाई को हँसते हँसते पार करवाता है।
अगर गिर जाए तो
संभलना भी सिखाता है
वह गुरु ही है
जो अंधकार में भी रोशनी के दीप जलाता है।
आप हमारे विद्यालय के वो कल्पवृक्ष हो, जो हर बाग में नही खिला करते है
वो खुशनसीब होते जिन्हें आप जैसे गुरु मिलते है।
Sir आज आपकी विदाई में क्या कहूं
आंखें भर भर आयी है
हर विद्यार्थी के दिल मे
एक कृति उभर आयी है
सुना हुआ विद्यालय का आंगण
अब हमें कौन मोटीवेट करेंगा
आप जैसे गुरु के बिना
कैसे हम अब रह पायेंगे
बस इतनी सी दुआ करते है
हम बच्चों पे भी अपनी कृपा बरसाए रखना
कभी कभी हमसे मिलने और हमे प्रोत्साहित करने
इस शिक्षाभवन में आते रहना।
जिंदगी तो वो नन्ही सी कली है जो खुद खुदा बुनता है, माता पिता उसे गढ़ के एक प्यारा फूल बनाते है और गुरु उस फूल में आत्मविश्वास, ओज और क्रांति का मिश्रण करता है जिससे वह नन्हा फूल एक दिव्य प्रकाश बन लोगो को सन्मार्ग दिखाता है और भविष्य को उज्ज्वल प्रकाश के हाथों समपर्ण कर देता है।
एक दिव्य प्रकाश का दिव्य हाथों हुआ पदार्पण है
ज्योत से ज्योत सजी, सज गया प्रांगण है
झिलमिल सितारे सारे करते आपको वंदन है
ज्ञान की अलख जगाने वालो को मेरा सत सत अभिनंदन है।
आज भी याद आती है वो क्लासरूम की बाते
वो वक़्त जिसमे हमे आप जैसे गुरु का सानिध्य प्राप्त हुआ
हर दिन कुछ नया सीखा, नीव यही से पड़ी थी
एक बंजर भूमि को उपजाऊ आपने ही तो बनाया था ।

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