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दीक्षा पे संवाद | Play for Jain Diksha | Diksha pe kavita

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पांचला की धरा पे जन्म हुआ एक अबोध बालिका का
पारख कुल का खिला उपवन महके सारे सुमन
खुशियों के दीप जले, हर्षित हुआ कण कण
रोशनी का हुआ आरोहण, खिला एक कमल

………Song to be played……..
छोटी सी प्यारी सी आयी कोई परी
भोली सी प्यारी सी अच्छी सी आयी कोई परी
पालने में ऐसे ही झूलती रहे
खुशियों की बहारो में झूमती रहे।
Members- All brother and sisters

बाल्यकाल
गोदी में झुलाया, पलको पे जिसे बिठाया
खुशियों के आंगण में जिसे खूब खिलाया
जिसकी अठखेलियाँ से खिलता कभी यह आंगण था
जो आज छोड़ चली पारख कुल का प्रांगण है।

Play game ( घोड़ा चमार खाये)

वैराग्य से पहले(b/w two ppl)
धर्म का जहाँ न कोई सहारा था
आज मिलो दूर बन गयी आज पगडंडी है
रात्रि भोजन और जमीकंद के बीना नही जहाँ गुजारा था
आज त्याग कर दिया जीवो को अभयदान था।

Sing song
कल्पवृक्ष खुद ही चलकर इस आंगण में आया है
पंचम आरे में जन्मे पर संयम इनका सवाया है।

संवाद
दीक्षार्थी और उसकी बहन- संयोग कहे या आपश्री की तकदीर कहे
त्रिशला मरासा के हुए दर्शन आपको मिला नया दर्पण
अंकुर धर्म के फूटे हाथ मे गुलज़ार

संवाद
दीक्षार्थी और उसकी बहन- संयोग कहे या आपश्री की तकदीर कहे
त्रिशला मरासा के हुए दर्शन आपको मिला नया दर्पण
अंकुर धर्म के फूटे हाथ मे गुलज़ार लिए
कदम आपके बढ़े आंखों में हज़ार सपने लिए।

Sing song
कल्पवृक्ष खुद ही चलकर इस आंगण में आया है
पंचम आरे में जन्मे पर संयम इनका सवाया है।

संवाद
दीक्षार्थी और उसकी बहन- मत्थएण वंदामि 

मरासा- दया पालो

(मुखवस्त्रिका व सामायिक)

दीक्षार्थी और उसकी बहन-मरासा सामायिक पच्चखाओ

मरासा- करेमि भंते

दीक्षार्थी की बहन- मरासा मुझे संवर पच्चकखाओ

दीक्षार्थी बहना- जीजी आप संवर करोगे तो में भी संवर करुँगी

दीक्षार्थी की बहन- ठीक है तुम भी संवर पचक्ख लो

मरासा- करेमि भंते !
सामाइयं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि,
जाव नियमं पज्जुवासामि,
दुविहं, ति-विहेणं,
मणेणं, वायाए, काएणं,
न करेमि, न कारवेमि, तस्स भंते !
पडिक्कमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि

मरासा का उदबोधन

बहनों, संसार गहरा समुन्द्र है, डूबते हुए जाना है
ले लो धर्म की शरण भवजल को मिला किनारा है
झूठे रिश्ते नाते स्वार्थ के नज़ारा है
पंचम आरे में कौन सुख से रह पाया है
बहनों धर्म का मार्ग प्रशस्त है मिला कितनो को किनारा है
अहिंसा की पगडंडी हर रोज़ यहाँ नया सवेरा है
अम्बर मुस्कुराता है, धरती पाल बिछाती है
धर्म की पगडंडी पे कोयल सदा मुस्कुराती है।

सुन के अद्भुत वचनों को मोह जिसका छूट गया
वैराग्य का भाव उमड़ा, संसार सारा पीछे छूट गया।

(दीक्षार्थी बहन और उसके सांसारिक पिता)

दीक्षार्थी बहन- पापा में तो दीक्षा लेउ

पिताजी- कही दीक्षा लेवे रात रे तो जीमें, आलू कांदा खावे, भले केवे दीक्षा लेउ

दीक्षार्थी बहन- नही पिताजी हम नही खाऊ, रात्रि भोजन नही कर, जमीकंद का त्याग करू,मन तो मरासा रे जावना है,अच्छी अच्छी बातें सीखनी है।

……सबको मनाने के लिए किया पच्चकखान…..

पिताजी- (कुछ दिनों बाद)ठीक है बेटा मरासा के चली जा। अब पारणा तो कर ले।

Play song
कल तक जो नन्ही सी लली थी
कोमल सी ……….
……
…..
क्या वो वही लड़की है।

दीप प्रज्वलित हुए, हुआ नया सवेरा है
पारख कुल का प्रांगण रोशनी से हुआ उजियारा है
झिलमिल सितारे सारे करते आपको वंदन है
वीर माताजी पिताजी को हमारा सत सत अभिनंदन
निर्मल विचारों के प्रतिरूप खुशियों से खिलता आंगण है
आपकी ही प्रतिरूप से सज रहा जिनशासन का प्रांगण है
देते दुआ हम सब, करते सत सत अभिन्नन्दन
वीर पथ पर चलने वाली बहना तुझे ढेरो शुभकामनाएं है।

Sing song
(Related to dikhsha)

यह संवाद दीक्षा में बहुत उपयोगी है, इससे पूरा दीक्षार्थी बहन का जीवन परिचय और सबकी सहभागिता सम्मलित है। इसका आप उपयोग कर
दीक्षार्थी बहन का पूरी जीवनी और उसे संयम जीवन के शुभकामनाएं दे सकते है।

अगर आपको और भी दीक्षा पे कुछ content की आवयश्कता है तो आप कमेंट बॉक्स में लिख दे।

Read:

Poem on Diksha:https://nrinkle.com/2021/08/poem-on-jain-diksha-in-hindi/

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